॥ पुलस्त्य उवाच ॥
पुलस्त्य जी बोले–
॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ सिद्धलिङ्गं सुसिद्धिदम् ॥ सिद्धैस्तु स्थापितं लिङ्गं सर्वपातकनाशनम् ॥ १ ॥
हे राजेन्द्र! तत्पश्चात् मनुष्य सिद्ध महापुरुषों के द्वारा स्थापित सुंदर सिद्धियों को देने वाले सर्वपापविनाशक सिद्धलिंग सिद्धेश्वर के समीप जाय।।१।।
तत्रास्ति शोभनं कुण्डं सुनिर्मलजलान्वितम् ॥
तत्र नातो नरः सम्यङ्मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥ ॥ २ ॥
वहां पर सुंदर और स्वच्छ जल से परिपूर्ण एक मनोहर कुण्ड है। जहां स्नान करने से प्राणी ब्रह्महत्या से पूर्णतया छूट जाता है।।२।।
यं यं काममभिध्यायंस्तत्र स्नाति नरो नृप ॥
अवश्यं तमवाप्नोति निष्ठान्तेच परां गतिम् ॥ ३ ॥
जिस जिस कामना का चिंतन करते हुए मनुष्य वहां स्नान करता है। उसे वह फल अवश्य प्राप्त होता है और मरने के बाद उसकी उत्तम गति होती है।।३।।
इति श्रीस्कान्दे महापुराण एका शीतिसाइरूयां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे तृतीयेऽर्बुदखण्डे सिद्धेश्वरमहिमवर्णनंनाम त्रयश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥४३॥
इस प्रकार 81000 श्लोक वाली श्रीस्कन्द महापुराण रूपी संहिता के सातवें प्रभास खण्ड के तृतीय अर्बुद खण्ड में ” सिद्धेश्वर के माहात्म्य” का वर्णन करने वाला ४३ वां अध्याय पूर्ण हुआ।।

