
ईशावास्योपनिषद्, मन्त्र-२,मोक्षोपकारक निष्काम कर्मयोग
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।२।।
पूर्व मन्त्र से भगवान सबमें निवास करते हैं –यह बतलाया गया । इसका उद्देश्य है कि जगत में जो नानात्व की प्रतीति हो रही है,वह भ्रम मात्र है । हम सर्वत्र परमात्मा का अनुभव करें कि सब कुछ भगवान् ही हैं —-”सर्वं खल्विदं ब्रह्म” । हम जीवों का दिव्य ज्ञान कर्म रुपी अविद्या के कारण ढँक गया है ।
कर्म का एक नाम अविद्या भी है इसी कर्म रूपी अविद्या से क्षेत्रज्ञ जिसे जीव भी कहते हैं वह बंधा हुआ है और संसार के त्रिविध तापों का अनुभव करता रहता है—
“अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीयाशक्तिरिष्यते । यया क्षेत्रज्ञशक्तिस्सा वेष्टिता नृप सर्वगा ।।
संसारतापानखिलानवाप्नोत्यतिसंततान् ।”–विष्णुमहापुराण -६/७/६१-६२,
पुण्य पापात्मक कर्मरूपी अविद्या से जीव के स्वरूप का तिरोभाव
“पराभिध्यानात्तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ”–ब्रह्मसूत्र-३ //४,
के भाष्यकार श्रीरामानन्दाचार्य प्रभृति सभी आचार्यों ने मुक्त कंठ से सप्रमाण स्वीकार किया है । और भगवान् बादरायण के इस सूत्र के “पराभिध्यानात्तु” का अर्थ किया है कि जीव के तिरोहित स्वरूप का आविर्भाव भगवान् के अनुग्रह से होता है । तभी नानात्व भ्रम की निवृत्ति और परमानंद की अनुभूति होती है ।
भगवान् के इस अनुग्रह को प्राप्त करने का साधन है-”निष्काम कर्म”–जिसे भगवती ईशावास्य मन्त्र की प्रथम पंक्ति
से बतला रही हैं । ध्यातव्य है कि कर्म से ही जीव का स्वरूप आवृत हुआ है और यहाँ कर्म ही उसको अनावृत करने का साधन बतलाया जा रहा है । सकाम कर्म स्वर्गादिफल के द्वारा जीव को बांधते हैं ।
पुण्य सोने की जंजीर है और पाप लोहे की । दोनों ही बंधनकारक हैं अतः पाप के सामान ही पुण्य को भी ब्रह्मविदों ने पाप कहा है —
“ज्ञानविरोधि च कर्म पुण्यपापरूपम् । ब्रह्मज्ञानोत्पत्तिविरोधित्वेनानिष्टफ़लतया उभयोरपि पापशब्दाभिधेयत्वम्”-श्रीभाष्य –१/१/१,
पाप कर्म तो स्वरूपतः ब्रह्मज्ञान का प्रतिबंधक है अतः उसका तो सर्वथा त्याग ही कर देना चाहिए । रही पुण्यकर्मों की बात । ये स्वरूपतः प्रतिबंधक नहीं होते अपितु फल की कामना से होते हैं । अतः इनका स्वरूपतः त्याग नहीं करना है ।बल्कि इनके फल की इच्छा का त्याग आवश्यक है । अत एव भगवान गीता में कहते हैं कि यज्ञ दान तप जैसे कर्म करने ही चाहिए –
“यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्”-१८/५,
अत एव महाराज केशिध्वज के द्वारा ब्रह्मविद्या के उद्देश्य से अनेक यज्ञों के अनुष्ठान का उल्लेख विष्णुपुराण में
मिलता है –
इयाज सोऽपि सुबहून् यज्ञान् ज्ञानव्यपाश्रयः । ब्रह्मविद्यामधिष्ठाय तर्तुं मृत्युमविद्यया ।।-६/२ ,
यही तथ्य भगवती
ईशावास्य आगे चलकर ११वें मन्त्र में बतलायेंगी–
“विद्याञ्चचाविद्याञ्च यस्तद्वेदोभयँ स ह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ..”
और जो कर्मों का फ़ल “अन्तवदेवास्य तद्भवति –बृहदारण्यक -५/८/९ ,नह्यध्रुवैः प्राप्यते –कठ-२/१०, प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा –मुण्डक -१/२/७ , नास्त्यकृतः कृतेन” –१/२/१२,इन वाक्यों से क्षयिष्णु बतलाया जा रहा है और इनसे मोक्ष नहीं प्राप्त होता -यह कहा जा रहा है –इसका तात्पर्य सकाम कर्मों से है क्योंकि उनके फल स्वर्गादि नश्वर ही हैं ।
फलाभिसंधिशून्य होने पर वे ही कर्म ब्रह्मविद्याविरोधी पापों के विध्वंसक होकर मोक्ष के उपयोगी हो जाते हैं । उनसे भगवान् प्रसन्न होकर मोक्ष दे देते हैं । वस्तुतः कर्म वही है जिससे परमात्मा प्रसन्न हों—
“तत् कर्म हरितोषं यत्”–भागवतपुराण-४/२९/४९,
ध्यातव्य है कि जैसे सकाम कर्मों से जीव संसार में फंसा है वैसे ही भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म करने से वह उससे मुक्त भी होता
है । भगवान् उस पर प्रसन्न होकर मोक्ष दे देते हैं –यह बात – “पराभिध्यानात्तु”–इस ब्रह्मसूत्र से सप्रमाण बतायी जा चुकी है । इसी कर्मयोग के सिद्धांत को यहाँ बतलाया जा रहा है –”कुर्वन्नेवेह् कर्माणि”के द्वारा–
इह–इस लोक में, कर्माणि–भगवत्प्रीत्यर्थ विहित नित्य नैमित्तिक कर्मों को, कुर्वन्–करता हुआ, एव–ही, शतं समाः–१०० वर्ष तक, जिजीविषेत्–जीने की इच्छा करे ।
यहाँ जिजीविषेत् में लिङ लकार से विधान किया गया कि मुमुक्षुओं को जीवन पर्यंत भगवत्प्रीत्यर्थ ही विहित कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिए, स्वर्गादि फलों के लिए नहीं । तभी सर्वत्र भगवान् का दर्शन होगा और नानात्व भ्रम की निवृत्ति के साथ ही अहंता ममतारूपी पाश का छेदन भी ।
शतं समाः में शतं शब्द १०० का वाचक नहीं अपितु प्राप्त हुई आयु का उपलक्षण है । अतः जितनी भी आयु मिली है १००, -२००, ५००वर्ष, आदि । उसमें हम मुमुक्षुओं को हरिप्रीत्यर्थ ही कर्म करना चाहिए । भगवदाज्ञा का पालन करने से भगवान् अवश्य प्रसन्न होंगे । भगवान् की आज्ञा क्या है ? श्रुति और स्मृति—
“श्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे यस्त उल्लङ्घ्य वर्तते ।
आज्ञाच्छेदी मम द्रोही मद्भक्तोऽपि न वैष्णवः ।.”
कोई भी कर्म करें उसका फल स्वर्ग या नरक मिलेगा ही अतः बंधन होगा—ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए :क्योंकि भगवत्प्रीत्यर्थ किये गए कर्म का फल है बंधनप्रद सभी कर्मों का विनाश एवं अविरल भक्तियुक्त ज्ञान अर्थात प्रेमपूर्ण भगवद्दर्शन, शिशुपाल की भाँति द्वेषपूर्ण दर्शन नहीं । देखें ऐसे कर्म का फल—
“एवं नृणां क्रियायोगाः सर्वे संसृतिहेतवः ।
त एवात्मविनाशाय कल्पन्ते कल्पिताः परैः ।।
यदत्र क्रियते कर्म भगवत्परितोषणम् ।
ज्ञानं यत्तदधीनं हि भक्तियोगसमन्वितम् ।।”-भागवत-१/५ /३४-३५,
मनुष्य के लिए सभी कर्मों का सम्बन्ध संसृति का कारण है । किन्तु जब वे ही कर्म परमात्मा को समर्पित कर दिए जाते
हैं तब वे बंधनकारक सभी कर्मों के विनाश के कारण बन जाते हैं । इस लोक में जो भी कर्म भगवान् की प्रसन्नता के
लिए किया जाता है उसका फल है भक्तियोगमय भगवत्साक्षात्कार– प्रेम में विह्वल होकर सर्वत्र मात्र भगवान् का प्रत्यक्ष दर्शन, न कि नानात्व का दर्शन ।
ऐसा कर्मयोगी आकाश वायु, अग्नि, जल, पृथिवी, ग्रह, नक्षत्र, जीव जन्तु, दिशाएं ,
वृक्ष, पर्वत और नदियाँ इन सभी को भगवान् का शरीर समझकर अनन्य भाव से प्रणाम करता है—
“खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन् ।
सरित्समुद्रान्श्च हरेः शरीरं यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यः ।।”
–भागवत-११/२/४१,
यह है भगवत्प्रीत्यर्थ किये गए विहित कर्म का फल । मात्र ब्रह्म दृष्टि ही नहीं अपितु उसके आगे व्यवहार भी सबको ब्रह्म समझकर हो रहा है । इन पूर्वोक्त रहस्यों को ध्यान में रखकर भगवती ईशावास्य कह रही हैं—“एवं त्वयि”-
एवं–इस प्रकार, त्वयि नरे–तुझ जीव में, कर्म–किये गए कर्म, न लिप्यते–अपने नश्वर फल स्वर्गादि द्वारा लिप्त नहीं हो सकते । अर्थात् सांसारिक फल नहीं दे सकते ; क्योंकि उनकी शक्ति सर्वत्र भगवत्साक्षात्कार रूपी फल देकर उपक्षीण
हो चुकी है ।
यहाँ नरे शब्द का प्रयोग रहस्यमय है जिसका भाव है -“न रमते फलकामनया कर्मसु”–जो स्वर्गादि तुच्छ फलों की कामना से नित्य नैमित्तिक कर्मों में प्रवृत्त नहीं होता ऐसे भाग्यशाली मानव को यहाँ नर शब्द से कहा गया है ।
इतः–भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म के अतिरिक्त, अन्यथा–अन्य प्रकार का कोई मार्ग,न–भगवत्साक्षात्कार के लिए नहीं है ।
इन कर्मों में नित्य और नैमितिक २ प्रकार के कर्म आते हैं । नित्य कर्म हैं–सन्ध्यावन्दन, गायत्रीजप, अग्निहोत्र आदि
तथा नैमित्तिक कर्म हैं–ग्रहणकालिक स्नानादि । इनका भगवत्प्रीत्यर्थ अनुष्ठान करना चाहिए । अर्थात् नित्य नैमित्तिक कर्मों का अनुष्ठान करते समय उनके फल की भावना न रखते हुए प्रभु के प्रसन्नता की ही भावना रखनी चाहिए । यही निष्काम कर्मयोग है जो अनुष्ठित होने पर ब्रह्म का अपरोक्ष अनुभव कराता है ।
जय श्रीराम
#आचार्यसियारामदासनैयायिक

Gaurav Sharma, Haridwar
