ईशावास्योपनिषद्, मन्त्र-4,परमात्मा की विलक्षण शक्तिमत्ता
“अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ।।४।।”
पूर्व मन्त्र में निष्काम कर्मयोग की अवहेलना करने वाले की स्थिति बतलायी गयी । इस मन्त्र में यह बतलाया जायेगा कि जिस परमात्मा को ईशावास्यम् से सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त बतलाया गया है वह दूसरी और भी अनन्त शक्तियों का आश्रय है –
वह ईश्वर, अनेजत्– कम्पनरहित है ,सर्वत्र व्याप्त होने से कहीं आने जाने के लिए कोई भी कम्पन नही करना पड़ता, मनसो –मन से ,जवीयः –अत्यधिक वेगशाली है, अर्थात् मन के द्वारा उसे नहीं पकड़ा जा सकता , यशोदा जी जिस कान्हा को पकड़ने दौड़ीं उसे तपश्चर्या से शुद्ध संवृद्ध योगियों का मन भी नहीं प्राप्त कर सका –
“गोप्यन्वधावन्न यमाप योगिनां क्षमं प्रवेष्टुं तपसेरितं मनः ।” –भागवत-10/9/9,
वह परमात्मा निष्कम्प -निश्चल और मन से अधिक वेगशाली है –ऐसा सुनने में विरोध की गन्ध प्रतीत होती यदि पूर्वोक्त पद्धति से अर्थ नहीं किया जाता ।
एकं–वह एक है अर्थात् उसके समान या उससे अधिक कोई नहीं है –न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते –श्वेताश्वतर–6/8, न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो–गीता –11/43/43, ऐसा यह ब्रह्म, पूर्वं–पहले ही सृष्टि के आरम्भ में, अर्षत् –देवताओं को प्राप्त कर लिया था । सृष्टिकाल में वैकारिक अहंकार से मन और 10 देवता उत्पन्न हुए –दिशा ,वायु,सूर्य,वरुण,अश्विनीकुमार,अग्नि,इन्द्र,विष्णु,मित्र और प्रजापति –
वैकारिकान्मनो जज्ञे देवा वैकारिका दश । दिग्वातार्कप्रचेतोऽश्विवह्नीन्द्रोपेन्द्रमित्रकाः ।। –भागवत–2/5/30, इन देवताओं को तो भगवान् ने सृष्टिकाल में ही प्राप्त कर लिया किन्तु ये ,देवा –देवता ,एनत् –इन भगवान् को ,आज तक,न–नही,आप्नुवन् –प्राप्त कर पाये । अमर्षत् ऋषी गतौ गत्यर्थक ऋष् धातु का भूतकालबोधक रूप है। गति का अर्थ ज्ञान और प्राप्ति भी है ।
जो जिसको प्राप्त होता है वह भी उसे प्राप्त हो जाता है जैसे सीता जी श्रीराम को प्राप्त हुईं तो श्रीराम भी उन्हे प्राप्त हो गये । पर यहां स्थिति भिन्न है । भगवान् ने तो देवताओं को प्राप्त कर लिया पर ये देवता आज तक उन्हें प्राप्त न कर सके । यह एक वैशिष्ट्य है प्रभु का । वैसे प्राप्ति संयोगविशेष रूप है फिर देवताओं ने उन्हें कैसे प्राप्त नही किया क्योंकि संयोग तो द्विष्ठ (दो में रहने वाला)ही है –
इसका उत्तर यह है कि यद्यपि ब्रह्म अन्तर्यामी रूप से उनके हृदय में विराजमान होने से उन्हे भी प्राप्त ही है पर ऐसी प्राप्ति से दुःखं का समूल विनाश नही हो सकता –
“अस प्रभु हृदय अछत अविकारी । सकल जीव जग दीन दुखारी ।।” –मानस,
जैसे सोने का खजाना खेत में छिपा है किन्तु उसका ज्ञान न होने से उसके ऊपर चलनेमात्र से उसको नही प्राप्त कर सकते । देखें छान्दोग्य-8/3/2, वैसे ही हृदय में परमात्मा के रहने पर भी गुरु के उपदेश के विना अपनी बुद्धि से उसे नही जान सकते। यही स्थिति देवतओं की है । अतः वे हमारे पुनीत भारतभमि में जन्म की उत्कट लालसा से प्रार्थना करते रहते हैं –
“अहो अमीषां किमाकारि शोभनं –यैर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे ।।” –भागवत-5/19/21से28तक,
तिष्ठत्–सर्वत्र विद्यमान, तत्–वे परमात्मा,अन्यान्–दूसरे,धावतः–दौड़ने वालों वायु,गरुड़ आदि का ,अत्येति–अतिक्रमण कर जाते हैं । अर्थात् जहां जहां ये गतिशील वायु आदि पहुंचते हैं वहां वे पहले से ही वर्तमान हैं । सीधा शब्दार्थ लेने पर तिष्ठत् और धावतः अत्येति में विरोध होता जो इस अर्थ में अब नही है ।
तस्मिन्–उन सर्वाधार सर्वव्यापक परमात्मा में, स्थित होकर ही, मातरिश्वा–वायुदेव, अपो–जल, अप् शब्द यहां उपलक्षण है जो अपना बोध कराते हुए दूसरों का भी बोध कराये उसे उपलक्षण कहते हैं -स्वबोधकत्वे सति स्वेतरबोधकत्वम् । अर्थात् जल पृथिवी ग्रह नक्षत्रादि जितने भी पदार्थ हैं उन सबको ,दधाति –धारण करते हैं । परमात्मा की ही शक्ति से वायु अग्नि आदि सभी शक्तिमान् हैं।
इसलिए उनकी इच्छा के विरुद्ध एक तिनका को भी न तो वायुदेव उड़ा सके न ही अग्नदेव जला सके । देखें- कनोपनिषद् ,तृतीय खण्ड,अत एव सभी परमात्मा की शक्ति से ही उनकी इच्छानुसार कार्य करते हैं । सभी वस्तुएं दूसरों से धारण की हुई दिखने पर भी वे भगवान् से ही धारण की जा रही हैं —
“द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः ।वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः । ।”
इस प्रकार परमात्मा विचित्र शक्तियों का आश्रय है –
“पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च”-श्वेताश्वतर-6/8,
येशक्तियां स्वाभाविकी हैं औपाधिकी नही ।
विशेष–इस मन्त्र में तथा इससे पूर्व ईशावास्यमिदं से जो आरम्भ है वह ईश्वर का ही है –ईशा शब्द यही सूचित करता है । वैदान्त में स्पष्टतया जीव और ब्रह्म का वर्णन रूपक के ढंग से किया गया है कि दो पक्षी शरीररूपी वृक्ष में निवास करते हैं उनमें एक स्वादिष्ट भोजन खाता है और दूसरा विना खाये ही प्रकाशित रहता है–
“द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ।।” श्वेताश्वतर-4/6,
वहीं पर कहा गया है कि जब जीव अपने से भिन्न ईश्वर को देखता है तो शोकरहित हो जाता है –
“जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः” –मुण्डक-3/2,
इन मन्त्रों से जीव और ब्रह्म पृथक् पृथक् तत्त्व कहे गये हैं । अन्यत्र जीव का परिमाण भी बतलाया गया है कि बाल के अग्रभाग के सौवें भाग का सौववां भाग किया जाय वही भाग जीव का परिमाण है–
“बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते । ।” –श्वेताश्वतर–5/9,
इससे जीव की अतिसूक्ष्मता बतलायी गयी है । एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः –मुण्डक-3/19, से जीव का अणु परिमाण स्पष्ट ही कहा गया है । ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः -गीता से भी जीव की सत्ता पारमार्थिकी ही सिद्ध होती है कल्पित नही ।
जीव को अणु मानने पर ही स्वर्गादि लोकों में उसका गमनागमन सम्भव है । विभु -सर्वव्यापक मानने पर गमनागमन असम्भव हो जाने से –
“ये वै के चाऽस्माल्लोकात् प्रयन्ति चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति” –कौषी01/2, “एष आत्मा निष्क्रामति”–बृहदारण्यक-4/4/2, इत्यादिश्रुतिवाक्यों से विरोध होगा ।
यह आत्मा हृदय में रहता है –“हृदि ह्येष आत्मा”-प्रश्नोपनिषद् -3/6, ऐसी स्थिति में अणु आत्मा पादादि में होने वाली वेदना का अनुभव कैसे करेगा ? इसका उत्तर है कि दीपक जैसे एक स्थान में रहकर भी अपनी प्रभा से दूर की वस्तुओं का भी ज्ञान करा देता है वैसे ही जीव एक भाग में रहकर भी अपने ज्ञान गुण से सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर सुखादि का अनुभव कर लेगा । इस विषय पर ब्रह्मसूत्र के अध्याय2/3/19 से 33 तक खूब विचार हुआ है ।
यह आत्मा ज्ञानस्वरूप होने पर भी ज्ञाना के आश्रयरूप से प्रतीत होता है -अहं घटं जानामि -मैं घड़े को जानता हूं । ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव और-एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः-प्रश्नोपनिषद्4/9,आत्मा को द्रष्टा श्रोता आदि बतलाने वाली उपनिषद् से आत्मा ज्ञान का आश्रय है ,केवल ज्ञप्ति (ज्ञान)स्वरूप नहीं ।
कुछ लोग कहते हैं कि आत्मा तो ज्ञानस्वरूप ही है । किन्तु अहंकार अपने आश्रय के रूप में उसे अभिव्यक्त करता है । व्यञ्जकों का यह स्वभाव है कि वे अपने आश्रय के रूप में ही अभिव्यंग्य को अभिव्यक्त करते हैं। जैसे मुख को अभिव्यक्त करने वाला दर्पण अपने आश्रय के रूप में ही उसे प्रकाशित करता है । शीशे में मुख की प्रतीति आपामर को होती है । इसी प्रकार जड़ अहंकार स्वाश्रयतया आत्मा को प्रकाशित करता है-घटमहं जानामि -मैं घड़े को जानता हूं ।
यदि अहं आत्मा का धर्म होता तो सुषुप्ति में इसकी प्रतीति होनी चाहिए थी। चूंकि सुषुप्ति में अहं की प्रतीति नही होती है । इसलिए यह आत्मा का धर्म नही है । जड़ अहंकार का धर्म है ।
पर यह कथन ठीक नहीं क्योंकि जो आत्मा को मात्र ज्ञानस्वरूप मानते हैं वे उसे स्वयं प्रकाश भी मानते हैं । जड़ अहंकार जो स्वयं अपना प्रकाश नहीं कर सकता वह आत्मत्वेन अभिमत ज्ञप्ति का प्रकाश क्या करेगा ? और यदि ज्ञप्ति को अहंकार से व्यंग्य–प्रकाश्य माने तो ज्ञप्ति परप्रकाश्य घट पटादि की भांति अननुभूति (अनुभूति से भिन्न)सिद्ध हो जायेगी ।
इसलिए आत्मा ज्ञाता और ज्ञानस्वरूप भी है । परमात्मा भी सर्वज्ञ होने से ज्ञान का आश्रय है –
“यः सर्वज्ञः सर्वविद् ।”-मुण्डकोपनिषद्-१/१/९, +२/२/७,
सम्पूर्ण जीव और प्रकृति उसके शरीर हैं । वह एक है । एकं से बतलाया गया कि उसके समान या अधिक दूसरा नही है । यहां जीव या प्रकृति की सत्ता का अपलाप एकं से नही किया जा रहा । जैसे कक्ष में एक ही व्यक्ति है -ऐसा कहने से दूसरे व्यक्ति का अभाव बतलाया जा रहा है न कि उस व्यक्ति के वस्त्र रूप गुण या अन्य किसी वस्तु का अभाव । वैसे ही यहां भी एकं से परमात्मा के समान या अधिक कोई वस्तु नही है -यही बतलाया जा रहा है न कि उसके गुण आदि का अभाव ।
जय श्रीराम
#आचार्यसियारामदासनैयायिक

Gaurav Sharma, Haridwar
