ईशावास्योपनिषद्,मन्त्र-६,ब्रह्ममय दर्शन का फल
यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ।।6।।
पूर्वमन्त्र में बतलाया गया कि परमात्मा सभी वस्तुओं के बाहर भीतर है । वह वैसे ही है जैसे शरीर में जीव । पूर्व मन्त्रके “तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्य बाह्यतः” इस अंश का अभिप्राय बृहदारण्यक का यह अंश सुन्दर और विस्तार से उद्घाटित कर रहा है-
“यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं–”
इस वाक्य में सुस्पष्ट कहा जा रहा है कि सम्पूर्ण प्राणियों में वह परमात्मा स्थित है और सभी प्राणी उसके शरीर हैं –यह तदन्तरस्य सर्वस्य का भाव है । वहीं बृहदारण्यक में पृथिवी जल तेज वायु आकाश अन्तरिक्ष आदि के नामों का उल्लेख करके सबमें भगवान् के निवास का कथन करते हुए सबको परमात्मा का शरीर बतलाया गया है । यहां तक कि आत्मा भी भगवान् का शरीर कहा गया है-
“य आत्मनि तिष्ठन् आत्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्मा ऽन्तर्याम्यमृतः”-सुबालोपनिषद्,७,
जो आत्मा में स्थित होकर आत्मा से भिन्न है जिसे आत्मा नही जानता आत्मा जिसका शरीर है । आगे चलकर
“यस्य मृत्यः शरीरं यं मृत्युर्न वेद एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः”-
इस अंश से उस सर्वभूतान्तरात्मा को नारायण शब्द से अभिहित करके जीव से भिन्न बतलाया गया है । इसी जीव का निर्देश अन्यत्र “विज्ञान” शब्द से किया गया है-
“यो विज्ञाने तिष्ठन् विज्ञानादन्तरः”-3/7/22-इति काण्वाः ।
-जो विज्ञान के अन्दर रहता हुआ उससे भिन्न है-इत्यादि काण्व शाखा के अनुयायी कहते हैं । अब विज्ञान के स्थान पर आत्मा शब्द रखकर माध्यन्दिन शाखानुयायी कहते हैं –
“य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं-”-बृहदारण्यक-3/7/23,
ध्यातव्य है कि इस बृहदारण्यकोपनिषद् से आत्मा-जीव को परमात्मा का शरीर बतलाया गया है । इन दोनों का तत्त्वतः अभेद नहीं हो सकता-
परमात्मात्मनोर्योगः परमार्थ इतीष्यते । मिथ्यैतत्;अन्यद् द्रव्यं हि नैति तद्द्रव्यतां यतः ।।-विष्णुपुराण-२/14/27, इस
विष्णुपुराण के प्रमाण से –ब्रह्म और आत्मा का ऐक्य–अभेदरूप सम्बन्ध वास्तविक है-यह बात मिथ्या है;क्योंकि अन्य वस्तु दूसरी वस्तु से मिलकर वही नही बन जाती ।
जैसे दुग्ध में जल मिलाने से वह दुग्ध नही बन जाता । इसीलिए तो हंस जल को छोड़कर दुग्ध दुग्ध पी लेता है । अतः भगवान् के दिव्य विग्रह में समाये हुए जीव भी उनसे नित्य सम्बद्ध होने पर भी भिन्न ही रहते हैं । इसीलिए मुक्त होने पर जीव को परमात्मा की प्राप्ति के साथ उसके साम्य की प्राप्ति कण्ठतः कही गयी है-
“मम साधर्म्यमागताः”-गीता 14/2, “तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।।”-मुण्डक-3/2/8,
भगवान् की समता जीव प्राप्त करता है-”तथा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ।”-मुण्डक-3/1/3,
परमात्मा के साथ जीव की क्या समता होती है मुक्ति मलने पर?
सुनें–भगवान् के आठ गुणों का आविर्भाव जीव में हो जाता है । वे गुण हैं अपहतपाप्मत्व (निष्पापता) विजरत्व (वृद्धावस्थाराहित्य)विमृत्युत्व (अविनाशित्व) विशोकत्व विजिघत्सत्व(छुधाराहित्य) अपिपासत्व (पिपासाशून्यत्व) सत्यकामत्व , सत्यसंकल्पत्व-
“एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः”-छान्दोग्य-8/1/5,
इस प्रकार सम्पूर्ण जीव तथा प्रकृति परमात्मा के शरीर हैं और वह उनमें निवास करता है । अतःसर्वभूत शब्द से जीव तथा समग्र प्रकृति का ग्रहण समझना चाहिए । सर्वव्यापक परमात्मा के सर्वत्र होने से सम्पूर्ण भूत–समस्त प्रकृति और जीव परमात्मा मेंवैसे ही हैं जैसे सूत्र में माला (सूत्रे मणिगणा इव)। और जैसे माला में एक ही सूत्र अनुस्यूत है वैसे ही सम्पूर्ण भूतों में एक ही परमात्मा ।
इसी तथ्य को इस छठे मन्त्र से बतलाया जा रहा है-
यः–जो प्राणी ,तु–निश्चितरूप से, सर्वाणि –सम्पूर्ण,भूतानि–प्राणियों -वस्तुओं को,आत्मनि –परमात्मा में ,एव–ही,अनुपश्यति–देखता है । और सर्वभूतेषु–सम्पूर्ण प्राणियों में ,च–निश्चित ही, आत्मानं–परमात्मा को, देखता है । ततो–इसलिए,किसी से भी वह, न विजुगुप्सते –घृणा नही करता ।
सर्वत्र इस ब्रह्मात्मक दर्शन का मुख्य फल आत्यन्तिक दुःखनिवृत्ति ही है पर इसका लौकिक जीवन पर भी गम्भीर प्रभाव पड़ता है कि हम घृणारूपी महाज्वाला से दग्ध होने से बच सकते हैं जो एक असाध्य रोग है । यह इसका आनुषंगिक फल है । इतना ही नही, इस मन्त्रके अर्थ का अनुसन्धान करने से राग द्वेषादि समग्र माया- मोह-दल का निर्मूलन हो जाता है ।
आज समाज ही नही पूरे राष्ट्र किंवा सम्पूर्ण विश्व में घृणा का साम्राज्य व्याप्त है । उसे कोई जाति ,पार्टी या सरकार निर्मूल नहीं कर सकती । पर इस महामन्त्र का प्रचण्ड भावनाभास्कर उसे सद्यः नष्ट कर सकता है ।
जय श्रीराम
#आचार्यसियारामदासनैयायिक

Gaurav Sharma, Haridwar
