कार्ष्णि स्वामी गुरुशरणानंद जी का एक वीडियो वाट्स एप्प के माध्यम से कतिपय सज्जनों द्वारा मुझे प्राप्त हुआ। इतने महान् व्यक्तित्व वाले स्वामी जी ने ऐसा क्यों किया ? जिससे आस्तिक मात्र व्यथित हुआ। प्रतीक्षा के बाद भी किन्हीं महानुभाव ने उत्तर नहीं किया तो मुझे आज समीक्षा हेतु आना पड़ा ।
भागवत महापुराण-3/3/24श्लोक में उद्धव विदुर संवाद है। जिसमें यदकुमारों एवं भोजकुमारों का वर्णन आया है कि वे सब द्वारकापुरी में क्रीड़ा करते हुए दुर्वासा आदि मुनियों के समक्ष पहुंचे और साम्ब को स्त्री वेश में ले जाकर उसे पुत्र होगा या पुत्री ऐसा प्रश्न किये। यह उन कुमारों की उद्दण्डता ही थी-
अविनीता विनीतवत्-भागवतपुराण-11/1/13,
मुनि जन क्रुद्ध होकर शाप दिये; क्योंकि यही भगवान् को अभिमत था–
कोपिता मुनय: शेपुर्भगवन्मतकोविदाः ।।
भा॰पु·-3/3/24
भगवान् को क्यों अभिमत था; क्योंकि वे सब यदुवंशी शौर्य, वीर्य और सम्पत्ति से उद्धत हो चुके थे
तदिदं यादवकुलं वीर्यशौर्यश्रियोद्धतम्।
यह उद्दण्डता मुनियों के समक्ष साम्ब को गर्भवती स्वरूप में प्रस्तुत करने से अभी बतलायी जा चुकी है। जब भगवान् की अवस्था 125वर्ष की हो चुकी
शरच्छतं व्यतीयाय पञ्चविंशाधिकं प्रभो ।
भागवतपुराण- 11/6/25
उस समय भगवान् यदुवंशियों के नाश का आरम्भ होना ब्रह्मा जी से बतला रहे हैं-
इदानीं नाश आरब्ध: कुलस्य द्विजशापतः ।
भागवतपुराण-11/6/31
इससे यह सिद्ध हो रहा है कि भगवान् के अनुचर साम्ब आदि द्विजशाप से शास्त्रविरुद्ध कुछ आचरण अपना चुके हैं। जिसे सहन न कर पाने के कारण भगवान् इन सबका विनाश करना चाहते हैं-“विनाशाय च दुष्कृताम्”- भगवान् की प्रतिज्ञा है ही।
जिस दिन ब्रह्मा जी से संवाद हुआ है। उसी दिन देवों के जाने के बाद।द्वारकापुरी में महान् उत्पात आरम्भ हुए । जिसे देखकर भगवान् श्रीकृष्ण ने ज्ञानी पुरुषों के साथ मन्त्रणा करके यह निश्चय किया कि इन उत्पातों से महान् संकट समुपस्थित है। इसलिए हम सबको प्रभास क्षेत्र चलकर विनों को भोजन, दान दक्षिणा आदि देकर इनसे बचने का प्रयास करना चाहिए। तत्पश्चात् भगवान ने उद्धव जी को ज्ञान का उपदेश देकर बद्रिकाश्रम जाने को कहा है।
इधर भगवान् ने नारियों, बालकों और वृद्धों को शंखोद्धार तीर्थ में भेज दिया। (त्रित मुनि के शाप से शंख बने हुए कक्षीवान् मुनि का जहां उद्धार हुआ उसे शंखोद्धार तीर्थ कहते हैं- वंशीधरी – 11/30/6, )
प्रभासक्षेत्र में विप्रों के लिए भोजन दानादि अनेक प्रकार के कार्य सम्पन्न हुए। विप्रभोज भगवदर्पित प्रसाद रूप भोजन से किया गया है–
अन्नं चोरुरसं तेभ्यो दत्वा भगवदर्पणम्।
भागवत महापुराण-3/3/28
ये सभी लोग अत्यन्त धार्मिक हैं। गौ और स्वाध्याय परायण विनों के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर देने वाले हैं–
गोविप्रार्थासव: शूरा: भागवतपुराण- 3/3/28
ऐसी स्थिति में कोई महानुभाव इन्हें अधार्मिक समझे तो यह उनके मस्तिष्क की कल्पनामात्र है |
सभी परिजनों ने भी बिनों से अनुज्ञा लेकर भोजन किया।चूंकि तीर्थ में मद्यपानादि निषिद्ध है। फिर भी “विनाश काले विपरीत बुद्धिः” इसलिए इन लोगों ने उस पवित्र प्रभास तीर्थ में मदिरापान किया।यहां श्रीधर स्वामी लिखते हैं-
“दिष्टेन दैवेन विभ्रंशितधियः। नह्यन्यथा तस्मिन् स्थाने
तदुचितमिति भाव:।”-श्रीधरीटीका-11/30/12
यहां श्रीधर स्वामी बतला रहे हैं कि तीर्थ स्थान में मद्यपान उचित नहीं है । फिर भी दैवकोप से उन लोगों की बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी थी। इसलिए ऐसा किया।यहां श्रीधर स्वामी राजपरिवार के लिए मद्य का निषेध नहीं कह रहे हैं। अपितु तीर्थ में मद्यपान को गर्हित बतला रहे हैं; क्योंकि–
सीतामादाय हस्तेन मधु मैरेयकं शुचि ।
पाययामास काकुत्स्थ: शचीमिव पुरन्दर:।।
बाल्मीकिसमायण, उत्तरकाण्ड-42/18-19
जानकी जी को पवित्र मैरेयक मधु का पान भगवान् सम ने कराया। यहां मधु मैरेयक को पवित्र बतलाया गया है। निश्चित है कि जब मैरेयक बनाने में निर्माता उन्मादक पदार्थों को आवश्यकता से अधिक डाल देता है। तब वह बुद्धिभ्रंशिका होने के कारण अपवित्र मानी।गयी है। और ऐसी ही मदिरा का पान यादवों ने किया था
ततस्तस्मिन् महापानं पपुर्मैरेयकं मधु ।
दिष्टविभ्रंशितधियो यद्द्रवैर्भ्रश्यते मति: ।।
9TT——- 11/20/12
मद्य अनेक प्रकार का है। किन्तु कदंबरस से बनायी गयी मदिरा को मैरेयक कहते हैं और इसका पान बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है –
कदम्बरससम्भूता मदिरा सुरसा भवेत् । सैव मैरेयकं प्रोक्तं यद्द्रवैर्भ्रस्यते मति:।। बंशीधरीटीका भागवतपुराण- 11/30/12,
इसलिए यदुवंशी आदि भगवान् के अनुचर राजपरिवार के लिए अनिषिद्ध मदिरा का पान करने से अधार्मिक नहीं कहे जा सकते; क्योंकि शास्त्र निषिद्ध आचरण ही अधर्म है, अनिषिद्ध आचरण नहीं। हां, विनों को कोई भी मदिरा नहीं पीनी चाहिए
गौडी पैष्टी च माध्वी च विज्ञेया त्रिविधा सुरा ।
यथैवैका तथा सर्वा न पातव्या द्विजोत्तमैः ।।
मनुस्मृति,
गौडी, पैष्टीऔर माध्वी इन तीनों मदिराओं में एक भी मध्य का पान विप्र को नहीं करना चाहिए। मद्यपी विप्र सदाचार से विभ्रष्ट हो जाता है।
अत: ब्राह्मणेतर क्षत्रिय आदि को मद्यसेवन से अधार्मिक या शराबी समझकर आरोप करना मित्र प्रज्ञापराध है।
अधार्मिकता उन सबसे यही हुई कि उन्होंने तीर्थ में मदिरापान किया था। वह भी विप्र शाप और दैवकोप के कारण। जिसका प्रमाण हम प्रस्तुत कर चुके हैं।
भगवान् को अपशब्द बोलने वाले स्वामी जी भी तो यदुकुमारों की भांति मानस आविनीतता का ही परिचय दे रहे हैं– यदि ऐसा कहें तो क्या उनका व्यथित नहीं होगा ?? इसका प्रायश्चित वे किस तीर्थ में करेंगे?
-#आचार्यसियारामदासनैयायिक

